सेजिया पे लोटे काला नाग हो, कचौड़ी गली सून कइले बलमू

पड़ गये झूले सावन रूत आई रे!
ई. एसडी ओझा

कजरी मूलतः एक पावस गीत है, जो पूर्वांचल में काफी चर्चित है. कजरी गीत लिखने में अमीर खुसरो सर्वोपरि गीतकार हैं, जिन्होंने इसे साहित्यिक विधा बनाया. उनका लिखा “अम्मा मेरे बाबा को भेजो जी कि सावन आया ” काफी लोकप्रिय हुआ था. इस विधा पर मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर ने भी हाथ आजमाया. उन्होंने लिखा, “झूला किन डारो रे अमरैया. ” हिंदी के मूर्धन्य साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद ने भी संस्कृत व हिंदी में कजरी रची थी. उनके हिंदी में रचे कुछ कजरी गीतों को सुप्रसिद्ध शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी ने अपना स्वर प्रदान किया था. कजरी एक उपशास्त्रीय विधा है, जो 19वीं शताब्दी आते आते ठुमरी व दादरा जैसे शास्त्रीय शैली के साथ जुड़कर अपनी अलग पहचान बनाने में सफल हुई है. जब भारत रत्न विस्मिला खां ने शहनाई पर इसे बजाया तो इसका कद और ऊंचा हो गया.

भारतीय पांचांग के अनुसार भाद्रपद कृष्ण पक्ष की तृतीया को सम्पूर्ण पूर्वांचल में “कजरी तीज ” मनाई जाती है. इस दिन महिलाएं व्रत रखती हैं. रतजगा होता है. मां विन्ध्यवासिनी देवी की पूजा अर्चना की जाती है. औरतें समूह में कजरी गायन करती हैं. गायन के साथ नृत्य भी होता है. विन्ध्यवासिनी देवी का मंदिर मिर्जापुर में है. यह 64 शक्तिपीठों में से एक है. कजरी में सर्वप्रथम विन्ध्यवासिनी देवी के गीत गाए जाते हैं. वैसे कजरी में वर्षा के गीत गाए जाते हैं ,पर अब समसामयिक विषयों पर भी कजरी गायन होने लगा है. (तस्वीरें – प्रतीकात्मक)

कजरी की उत्पति कजरारे बादल से हुई होगी. कुछ इसे राजा दादूराम और रानी नागमति से जोड़ते हैं. राजा दादूराम के मृत्यु होने के उपरांत रानी नागमति राजा के साथ कजली बन में सती हो गईं थीं. कजली बन से हीं कजरी शब्द की व्युत्पति हुई है. बनारस व मिर्जापुर में कजरी को बहुत संवर्धन व संरक्षण मिला. इसलिए कजरी यहां पर पूरे पूर्वांचल से ज्यादा फली फूली. यहां की कजरी में बनारस की कचौड़ी गली व मिर्जापुर का नाम अवश्य होता है.

सेजिया पे लोटे काला नाग हो,
कचौड़ी गली सून कइले बलमू.
मिर्जापुर कइले गुलजार हो,
कचौड़ी गली सून कइले बलमू.

कजरी में बलमू, ना, ए हरी और सखिया शब्द अंत में अक्सर आते हैं. जैसे –

रेलिया देले शहर में सीटी, अाज घरे बालम अइहें ना.
अरे रामा कृष्ण बने मनिहारिन,
पहिन के साड़ी ऐ हरी !
नीक सईंया बिन भवनवा नाहीं लागे सखिया.

सावन आज भी अपनी जगह पर है. आज भी वह छहर छहर के छहराता है, पर कजरी की आत्मा अब मरने लगी है. तथाकथित सभ्य लोग अब कजरी से कटने लगे हैं. अब गांवों में भी पेड़ों पर झूले लगने बन्द हो गये हैं. कजरी की गवैया बड़ी बूढियां स्वर्ग सिधार गईं हैं. नई पीढ़ी की लड़कियों को फिल्मी गानों से फुर्सत नहीं. अब पूर्वांचल में कजरी के दंगल नहीं होते. पुरूष समाज की अब कजरी गाने गवाने की रूचि समाप्त हो गई है. अाजकल फिल्मों में भी काफी लटके झटके नजर आ रहे हैं, पर कजरी गीत लुप्त हो गये हैं. कभी

लग गये झूले सावन रुत आई रे !
सीने में हूक उठे अल्ला दुहाई रे !
जैसे गीत फिल्मों की जान हुआ करते थे.

(मूलतः बलिया निवासी लेखक संप्रति चंडीगढ़ में रहते हैं. लेखक के फेसबुक वाल से साभार)

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